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सभी पूज्य संतगण, मंच पर विराजमान सभी वरिष्ठ महानुभाव और एकनाथजी की प्रेरणा से जीवन में कुछ न कुछ करने की जिन्होंने ठान के रखी है, और करते रहते हैं, ऐसे सभी उपस्थित वरिष्ठ महानुभाव!

मेरे लिए बहुत सौभाग्य  का यह अवसर है कि जिस महापुरूष को बचपन में हमारे लिए प्रेरणा के रूप में देखते थे, जिनके साथ छोटी आयु में कार्य करने का सौभाग्य मिला था, जिनकी सोच, हर पल कुछ न कुछ नया सिखाकर के जाती थी, ऐसे महापुरूष की शताब्दी पर्व के उद्घाटन समारोह में, उन्हें प्रणाम करने के लिए आने का, श्रद्धाभाव अभिव्यक्त करने का अवसर, उन्हीं के चरणों में जिसने अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय बिताया था, उस व्यक्ति को मिले, वो कितने बड़े गर्व की बात होती है, आप अंदाज कर सकते हैं। यहां पर बहुत लोग होंगे जिनका एकनाथजी के साथ स्वाभाविक संपर्क आया होगा। मेरा भी एकनाथजी के ही निकट संपर्क रहा और मैंने हमेशा पाया कि वो परफेक्शन (Perfection) के संबंध में इतना अग्रणी रहते थे कि कभी-कभी उनके साथ काम करनेवालों को भी अपने आपको उस लेवल (Level) पर ले जाने में बहुत कठिनाई महसूस करनी पड़ती थी।

जब विवेकानन्द रॉक मेमोरियल पर, स्वामी विवेकानन्दजी की प्रतिमा कैसी हो, उस पर निर्णय हो रहा था -  उन चर्चाओं को मैंने भी सुना था। विवेकानन्दजी की आंख किस तरफ देंखे, और उस आंख से क्यों दर्शन हो, इतनी बारीकी से, वे शिल्पकारों के साथ, चित्र बनानेवालों के साथ चर्चा करते थे। जब शिला स्मारक बन रहा है, तो सामुद्रिक हवा क्योंकि उसका अपना एक स्वभाव रहता है। उन पत्थरों का चयन किया जाए ताकि सदियों तक समुद्रिक जो Salt तथा Acid air जो रहती है उससे उनको कोई खरोंच न आए, उन पत्थरों का Selection कैसे करें। बनाने के बाद भी उनको लगा कि नई-नई आधुनिक टेक्नोलॉजी का कैसे उपयोग किया जाए, तो वो कौन सा केमीकल हो सकता है जिसको कुछ वर्षों के बाद अगर उसको लगा लिया जाए, तो इसे सुरक्षित रखा जा सकता है। जबकि ये उनके विषय नहीं थे। न ही वे इंजीनियर थे, न ही वे आर्किटेक्ट  थे, लेकिन यह उनकी विशेषता थी कि जो भी करें स्थायी भाव से करें और जो भी करें भविष्य को ध्यान में रखकर करें, जो भी करें सहज-सरल-उपयोगी हो। उन बातों को लेकर वो हमेशा यह योजना करते थे। और ये विचार उनके मन में आना कि कोई काम करें, जन भागीदारी से करें, शायद हिन्दुस्तान में यह पहला इनिशेटिव (initiative) था जिसमें जन भागीदारी का इतना व्यापक आयोजन था और समर्थन था।

हिन्दुस्तान के 40 साल से ऊपर के किसी भी व्यक्ति के पूछो तो बहुत एक लोग ऐसा बताएंगे कि हां भई, उस समय,  विवेकानन्द रॉक मेमोरियल बनाने के लिए एक रूपया मैंने भी दिया था। इस देश के 40 वर्ष से ऊपर के उमर के लोग आज भी स्वामी विवेकानन्द का वह रॉक मेमोरियल देखेगें, तो वहां जाकर उन्हें लगता है कि हां भई, इसमें मैं भी हूं, इसमें मेरा भी योगदान है।

हिन्दुस्तान के हर कोने में यह भाव जगाना कि शिला स्मारक भले की कन्यारकुमारी के समुद्री छोरों के बीच क्यों न हो, लेकिन मैं चाहे नार्थ-ईस्ट में हूं, चाहे मैं पश्चिमी भारत में हूं, चाहे मैं उत्तरी भारत में हूं या विश्व के किसी भी कोने में रह रहा हूं, लेकिन इस काम में मेरा भी योगदान है, मैं भी जुड़ा हूं, यह संस्कार, इमोशनल अटेचमेंट.  सिर्फ रूपयों का काम होता तो 40 -50 लोगों से डोनेशन ले सकते थे।

उनका दूसरा कौशल्य देखिए। इस देश में उस कालखंड में, जो राजनीतिक माहौल था वो एक राज्य के काम को और उसको अनुमोदन करने का, सराहना करनेवाले नेचर का वातावरण नहीं था। एक प्रकार से उस समय का जो राजनीतिक establishment था, इस प्रकार की प्रवृत्ति को राजनीतिक विरोधी खेमे के रूप में देखते थे। वैसा माहौल था, लेकिन एकनाथजी ने हिन्दुस्तान का कोई मुख्यमंत्री ऐसा नहीं होगा, कोई गवर्नर ऐसा नहीं होगा, केन्द्र को ऐसा कोई मंत्री नहीं होगा जिसके यहां जाकर के दरवाजे पर दस्तक न दी हो। एक-एक के पास खुद गए शिलास्मारक की योजना बनाई और शायद हिन्दुस्तान का कोई राज्य ऐसा होगा जिस सरकार ने, सरकार की तरफ से इसमें डोनेशन देकर के हिस्सेदारी न की हो। ये काम छोटा नहीं है। यानी अगर उम्दा उद्देश्यों को लेकर चलें, तो किसी भी राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित लोगों को भी अच्छे काम के लिए जोड़ा जा सकता है। और इसलिए एकनाथजी के हर कार्य के मूल बिन्दु में एक भाव रहता था- जोड़ना। हर प्रकार की चीज को जोड़ना। वे भूतकाल को भविष्य के  साथ जोड़ने में लगे रहते थे। वे विपरीत विचारधाराओं को भी जोड़ने में लगे रहते थे। उनके इस व्य़क्तित्व के कारण 1975 में जब आपातकाल आया, संघ परिवार के लोग लोकतंत्र में विश्वास करनेवाले लोग सारे जेल में थे, लेकिन एकनाथजी उस समय शासन में बैठे हुए लोगों के लिए भी, बातचीत करने का एक अच्छा माध्यम बने हुए थे। यह बात शायद उतनी प्रकट नहीं हुई है।

जिस प्रकार से विनोबाजी भावे उस समय आपातकाल में, श्रीमती इंदिरा गांधी के लिए एक जगह बने थे, वहां जाते थे, विनोबाजी का उनको थोड़ा एकाध वाक्य उनके काम में भी आ गया था। लेकिन एकनाथजी रानडे पूरी स्थितियों में से बाहर कैसे निकला जाए, किन-किन लोगों से विचार-विमर्श किया जाए, शासन में बैठे हुए लोगों को एकनाथजी पर भरोसा था कि इनसे बात की जा सकती है। एक महत्वपूर्ण भूमिका, क्योंकि उन दिनों में मैं उनके साथ रहा था। मैंने उनके इस कार्य को निकटता से देखा था। क्योंकि सबको लगता था कि एकनाथजी को कभी अरेस्ट कर लेंगे और एकनाथजी को भी जेल में डाल देंगे। लेकिन उनके इस व्यक्तित्व के कारण वे एक प्रकार से उन दिनों में, माहौल और ज्यादा न बिगड़े, समस्याओं के समाधान के रास्ते खोजे जाएं। इसमें अहम भूमिका एकनाथजी रानडे ने निभाई थी। लेकिन वे स्वयं प्रचार-प्रसिद्धि से दूर रहते थे, अपने काम में डूबे रहते थे। इसलिए इन बातों को कभी उनकी तरफ से उजागर नहीं किया गया।

व्यक्ति की पहचान और व्यक्ति की खोज, यह उनकी विशेषता रहती थी। एक बार, उन्होंने कहा कि मैं फलाने-फलाने ट्रेन से आ रहा हूं तुम रेलवे स्टेशन पर आ जाओ और वहीं स्टेशन पर नजदीक में स्नान-वान करके मेरे साथ माउंट आबू को चलो। मुझे  मालूम नहीं था क्या काम है, कैसा है ? अब मैंने देखा कि उनका  कोई रिजर्वेशन नहीं था। तो उस समय शायद थर्ड क्लास रहता था। तो ऐसे ही शायद बैठकर आए होंगे। बड़े थके हुए नजर आ रहे थे। मैंने कहा, थोड़ा आराम कीजिए। नहीं, नहीं, बोले- आबू पहुंचना है, तो चलो मेरे साथ। वहीं स्टेरशन के पास एक जगह स्नान-वान हो गया और हम चल दिए। रास्ते में उनसे मैंने पूछा कि क्यों, आप एकदम से निकले हो। तो रामकृष्ण मिशन के एक स्वामीजी जो रामकृष्ण मिशन से अलग होकर करके आबू में रहकर साधना वगैरह करते थे, एक अलग से जीवन व्यतीत करते थे, वो उनको मिलना चाहते थे। हम गए, और मैंने देखा कि जिस श्रद्धा से उनको प्रणाम किया...हम तो एक स्वयंसेवक के रूप में उनके पास थे, हमारा तो कोई रोल ही नहीं था, चीजों को देखने का ओब्जर्व करने का अवसर मिला। वो उनको आग्रह करने लगे कि ठीक है अब आप रामकृष्ण मिशन की व्यवस्था से बाहर हुए हैं, अलग से काम कर रहे हैं, लेकिन इतना बड़ा काम है, आप विवेकानन्द शिलास्मारक की व्यवस्था से जुडिए और आपकी जो तपस्या है वह देश के नौजवानों को प्रेरणा दे, इसके लिए काम कीजिए। यानी कि, माउंट आबू में बैठे हुए एक इंसान को अपने काम से जोड़ने के लिए इतना परिश्रम उठाकर आना और तीन दिन रुककरके हर आधे-पौने घंटे के बाद फिर सीटिंग होना, फिर दो घंटे के बाद फिर बैठना, फिर बात करना, खुले मन से चर्चा करना। पूरी तरह pursue करते रहना। मैं देख रहा था कि एक काम के लिए, और एकनाथजी के लिए कहा जाता है- One life one mission (एक जीवन-एक ध्येय), इसे जी करके दिखाया था उन्होंने!

उस काम की सफलता के लिए लोग कैसे मिले ? उन्होंने जब देश के युवा धन को राष्ट्र निर्माण में लगाने के लिए जो कल्पना की, युवकों को जो आह्वान किया कि जो स्वामी विवेकानन्द के लिए श्रद्धा रखते हैं, तो जी करके दिखाइए। हमें स्वामी विवेकानन्द अच्छे‍ लगे इतने से बात बनती नहीं है। उन्होंने भारत मां का जो रूप देखा है, जो कल्पना की है, उसको चरितार्थ करने के लिए हमारा भी तो कोई योगदान होना चाहिए, इस बात को लेकर वो लगे रहते थे। बहुत ही आग्रह से उस काम को करते थे -  देश के युवाओं में चेतना जगाने के लिए।

मैं देख रहा था कि, उस समय जब गुजरात में इस प्रकार के युवकों का साक्षात्कrर होता था जिनको बाद में इस प्रक्रिया में जोड़ना होता था। साक्षात्कार के लिए जो लोग बैठते थे तो मुझे भी उसमें बैठने का सौभाग्य मिलता था। उनकी जो टीम आती थी, साक्षात्कार करती थी। पहला लेयर जो पार होता था, बाद में एकनाथजी स्वयं उनसे बात करते थे। मैं देख रहा था उस पूरी प्रक्रिया से जब एकनाथजी को कोई नौजवान मिलता था तो वो कहता था, ‘अब यहाँ से घर वापस नहीं जाना है। एकनाथजी ले जाओ मुझे। मैं अब जो कहेंगे कर दूंगा।‘ मैं समझता हूं यह अपने आप में बहुत बड़ी उनकी सिद्धि थी। स्वामी विवेकानन्दजी ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। उसी आदर्शों और उद्देश्यों की पूर्ति के लिए वो भी रामकृष्णन मिशन की सारी प्रवृत्तियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर करके, वर्ना कभी कभार एक ही प्रकार से दो संस्थानें आमने-सामने हो जाते हैं और parallel चलने लग जाते हैं। एकनाथजी को लक्ष्य‍ पर इतनी बड़ी श्रद्धा थी कि वे Means के विषय में ऐसी कोई चीज़ पसंद नहीं करते थे जिसके कारण, अंतिम जो लक्ष्य  है उस लक्ष्यको कोई चोट पहुचे और ये काम वो लगातार करते रहते थे। उनका उदार मन भी रहता था।

वे Perfectionist थे। सबने उनका परफेक्शन का स्वभाव कैसा है, बारीकी से देखा है। सादगी उनकी कैसी थी। इतना बड़ा शिला स्मारक बनाया, अरबो-खरबों रूपये का शिला स्मारक बनाया। लेकिन एकनाथजी स्वयं, वहां जिस कमरे में रहते थे उसकी छत टीन की थी, एक कमरा था। उसी में रहते थे। वर्ना इतना बड़ा construction का काम चल रहा है, अरबो-खरबों रूपये लगे हैं, वे भी अपने लिए अच्छा बढ़िया- सा मकान वहां बना सकते थे, छोटा बँगला बना सकते थे, उसमें रह सकते थे। दुनिया उनको बिल्कुल बुरा नहीं मानती। लेकिन उन्होंने अंत तक उसी छोटी सी कुटिया में, मैं उसे कमरा नहीं कहूंगा, कुटिया थी, टीन की एक छत थी, जो लोग उनसे परिचित है भलीभांति जानते हैं, उसी में रहे। यानी सपना पूरा करने के लिए सब कुछ करना और अपने लिए कुछ न करना, यह उन्होंने जीवनभर जी करके दिखाया। और परफेक्शनिस्ट के नाते, मैं नहीं मानता पूरे संघ परिवार में उनकी बराबरी भी कोई कर सकता है। वे, कागज हो तो कैसा हो, इसमें भी कम्प्रोमाइज नहीं करते थे।

एक बार गुजरात में आरएसएस का शिविर लगा था, वो आए थे। तो एक परिवार में हमने उनका ठहरने का प्रबंध किया था। उस परिवार में वो set ही नहीं हो पाए। डिस्टेर्ब रहते थे। तीन दिन रुकना था और कमरे में जब जाते थे, तो भी उनकी नजर वहां जाती थी, बाहर निकलते थे तो भी वहीं जाती थी। मैं पहले दो दिन नहीं मिल पाया। तीसरे दिन उनके पास गया। मैंने कहा कि एकनाथजी कैसा रहा, कोई कठिनाई तो नहीं हुर्इ ? क्योंकि हम बड़े शिविर में लगे थे और रात को वहां रूकते थे और फिर शिविर में आते थे। वे बोले ये जो ट्यूब लाइट हैं न, ये टेढ़ी लगती है। वो जब तक घर में थे उस परिवार के पास, जब तक उस ट्यूब लाईट को ठीक नहीं करवाया, वह चैन से नहीं बैठे।

मुझे बराबर स्मरण है कि परम पूज्य गुरूजी का स्वर्गवास हुआ। रात को नौ बजकर, पांच मिनट पर परम पूज्यनीय गुरूजी ने अपना देह छोड़ा। बाद में मीडिया को सूचना करनी थी। अब समय बदल चुका है। अब रात को 11 बजे खबर दो, तो भी पहुंच जाती है, टेक्नोथलॉजी इतनी बढ़ी हुई है। उस समय नौ बजे थे तो, यह आवश्यक था, जल्दी से जल्दी मीडिया को जानकारी दी जाए। आगे का प्रश्न कि अंत्येष्टि कब होगी, इसकी सूचना देनी थी। एकनाथजी वहां मौजूद थे, गुरूजी ने देह छोड़ा। एकनाथजी को कहा गया आप ड्राफ्ट बनाइए। अब आप कल्पना कर सकते हैं, गुरूजी के प्रति एकनाथजी की श्रद्धा, उनका समर्पण भाव, समय की पाबंदी, दुनिया को बताना है कि ऐसा हुआ है। अब ड्राफ्ट बनाने के लिए बैठे। समय की पाबंदी। उस समय कम्यूटर तो था नहीं। टाइप करें, तो वो भी बात बनती नहीं थी। उनके अक्षर बहुत छोटे होते थे। उनकी हैंडराइटिंग बहुत अच्छी थी। तीन-चार लाइन लिखते थे, उनको अच्छा नहीं लगता था तो कागज फेंक देते थे। पांच सात लाइन पर पहुंचते थे, फिर अच्छा नहीं लगता था। करीब आठ दस कागज Perfection नहीं आने के कारण, और उधर सब परेशान थे, कि मीडिया में देरी हो रही है। जल्दी कीजिए। खैर, एकनाथजी का Perfection का नेचर इतना हावी था कि वो नहीं कर पाए और मुझे याद है कि आबाजी थत्ते ने उनसे वह छीन लिया और कहा कि आपने जो किया है वह Perfect है और मैं इसे भेजता हूं और उन्होंने भेज दिया। और उनका यह जो कहीं पर भी एक शब्द इधर से उधर न हो जाए, यह उनकी विशेषता रही।

उनकी डायरी, मुझे मालूम नहीं उनकी डायरी को रखा गया, कैसे रखा गया, डायरी लिखने की उनकी अजब पद्धति थी। जैसे हम डायरी लिखते हैं वैसे वह नहीं लिखते थे। बहुत की अलग तरीका था। मिलनेवाले व्यक्ति, उनसे हुई बातचीत और उसमें से काम न आने वाली अपने जीवन में उपयोगी बात, उसको वे छांटते थे, उसे अपनी डायरी में एक कोने में लिखते थे। मुझे नहीं लगता कि उन्होंने अपनी डायरी कभी छोड़ी हो।

कितने परिश्रमी थे। वे कभी बीमारी सहन नहीं कर पाते थे। थोड़ी सी बीमारी से इतना Disturb हो जाते थे। परेशान हो जाते थे और अगल-बगलवाले को परेशानी हो जाती थी। कभी-कभी लगता है वो बालक अवस्था में हो जाते थे। मैं उनके निकट रहा हूं इसलिए मुझे लगता है जब मैं यहां आया हूं तो मैं और कोई भाषण करने की बजाय मैं ही कुछ पल के लिए एकनाथजी को जी लूं और इस जीने के भाव से मेरे हृदय से बातें जो निकली हैं।

उनकी श्रद्धा युवकों में थी। जो बात विवेकानन्दजी ने कही थी कि यदि मुझे 1000 युवक मिल जाएं, मैं दुनिया में यह कर सकता हूं। इनके मन में था विवेकानन्दजी जैसे युवक कैसे तैयार किए जाएं, वे इसी में लगे रहते थे। आज नार्थ ईस्ट के अन्दर इतना Silently जन सामान्य के जीवन में बदलाव का काम करने में विवेकानन्द केन्द्र ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है, बहुत बड़ी भूमिका। एकता के साथ-साथ इन कठिनाइयों के बीच भी हम देश के लिए कुछ कर सकते हैं। देश के लिए जी सकते हैं। अच्छे से अच्छे परिवार में पैदा हुए नौजवान सुख-संपन्न जीवन में पले-बढ़े ये नौजवान, एकनाथजी के कहने पर नार्थ र्इस्ट के जंगलों में अपनी जवानी खपा देने लग गए। ये छोटी चीज़ नहीं है और कभी कभार संन्यासी बनने से...ऐसी महान विरासत हमारे देश में रही है कि एक बार आप संन्यासी बने और कपड़े धारण किए तो यह समाज अपने आप एक ऊंचाई पर आपको set कर ही देता है। आपका मान-सम्मान करना, आपकी सुख-सुविधा की चिंता करना, इस समाज के सहज स्वभाव में है। लेकिन ऐसे कपड़े न पहनते हुए ऐसा जीवन जीने में बहुत दिक्कत होती है। क्योंकि समाज के मन में वो संन्यासी के लिए होता है, लेकिन ऐसे लोगों के लिए वह भाव नहीं होता है क्योंकि वो तो पतलून पहनकर आता है लेकिन भीतर से जीवन वो जी रहा होता है, जो एक संन्यासी से अपेक्षा होती है। यह एक ऐसा कठिन पल होता है जिस समय कभी-कभी समाज की उपेक्षा, कभी-कभी उदासीनता और कभी-कभी यह कहना कि ठीक है, आए हो बैठो। ऐसी अवस्था में इस जीवन को स्वीकार करते हुए इस जीवन को जीना, यह सबसे कठिन काम है। अगर आप राजनेता हैं, तो लीडरी का दबदबा होता है। अगर आप संन्यासी हैं, तो उस परंपरा का दबदबा होता है, लेकिन ऐसी कोई विरासत के बिना एक झोला लेकर चल पड़ना कि एकनाथजी ने कहा है, कि विवेकानन्दजी की प्रेरणा है। यह मैं समझता हूं कि यह एक असामान्य कार्य उन्होंने किया और ऐसे सैंकड़ों हजारों नौजवान लगे रहे।

दूसरा, उन्होंने इस आइडिया को institutionalise किया। परंपरा चलती रही, आज भी नौजवान हर वर्ष विवेकानन्द केन्द्र से जुड़ते हैं, अपने कैरियर को छोड़कर जुड़ते हैं और वहीं पर लग जाते हैं, आगे परिवार बसाते हैं तो भी परिवार के साथ आगे अपना जीवन वहीं खपाते हैं। पूर्णतया One life one mission के साथ, समाज सेवा के सिवाय कोई मार्ग नहीं। भारतमाता का कल्याण, स्वामी विवेकानन्द के सपने को साकार करने का एक संकल्प, यही उनके जीवन की विशेषता रही है। और इसलिए मैं समझता हूं कि देश के युवा के लिए रानडे शताब्दी वर्ष युवाओं के मन को जगाने का वर्ष है और युवा भारत को दिव्य-भव्य बनाने का मार्ग प्रशस्त करने का एक अवसर है। हमारा भारत युवा है वह दिव्य भी बने और भव्य भी बने। हम वो लोग नहीं हैं कि सिर्फ भव्यता चाहते हैं, हम वो लोग हैं जो दिव्यता भी चाहते हैं, क्योंकि विश्व भारत से दिव्यता की अनुभूति की अपेक्षा कर रहा है और भारत का गरीब से गरीब व्यक्ति भारत की भव्यता की अपेक्षा करता है। दोनों का मेल करके इस देश के निर्माण की दिशा में हमें आगे बढ़ना है। इस काम की पूर्ति के लिए, मैं समझता हूं एकनाथजी की सहस्राब्दी हम लोगों को प्रेरणा देती है।

कभी-कभी सामान्य मानव के जीवन में एक उलझन रहती है। ज्यादातर लोगों के जीवन में, जीवन का मकसद होता है- सफलता, लेकिन विवेकानन्द केन्द्र हमें सिर्फ सफलता के मार्ग पर जाने की प्रेरणा नहीं देता है और यहीं पर बदलाव शुरू होता है। आप दुनिया में किसी को भी सुनिए, किसी को भी बताइए, हर कोई कहता है – भई सफल होओ! हर किसी का संदेश यही होता है। एकनाथजी का संदेश ‘सफल होओ’, यहां पर नहीं रुकता था। उनका आग्रह रहा था सार्थक हो। सार्थक होने के लिए सफलता एक स्टेशन है, जो सार्थकता की ओर ले जाने के लिए आखिरी स्टेरशन पर ले जाता है। लेकिन सफलता ये जिदंगी का अंतिम छोर नहीं हो सकती। आज का युग जो कि सफलता से ही बैंच मार्क हो गया है, उसे सार्थकता की ओर ले जाना, ये बहुत ही सार्थक प्रयासों की आवश्यकता रखता है।

जब मैं यह बात किसी को बताता हूं कि सफलता और सार्थकता में अन्तर क्या है तो, आज जगत इतना बदल गया है कि समझाना कठिन हो जाता है। लेकिन कोई सुने कि भई बिल गेट्स का काम क्या था ? माइक्रोसॉफ्ट के द्वारा दुनियाभर में बहुत बड़ा नाम बना किया। अरबों-खरबों रूपये कमा लिए। सफलता की ऊंचाइयों को पा लिया उन्होंने। लेकिन फिर – लगा सफल तो हुआ, सार्थक होना बाकी है। और तब क्या किया। सारे रूपये डोनेशन में दे करके चल पड़े। गरीब देशों में जाकर कहते हैं- टॉयलेट बनवाओ, और इसी में लग पड़े। वे जीवन की सार्थकता की अनुभूति कर रहे हैं। सफलता को सार्थकता की ऊंचाइयों तक कैसे ले जाएं। जीवन  सिर्फ सफल नहीं, जीवन सार्थक कैसे हो। ये सार्थक जीवन की दिशा...एकनाथजी रानडे की  जन्म शताब्दी वर्ष में हम संदेश देने में सफल होते हैं तो हमारे देश की युवा पीढ़ी को एक नया चिन्तन, नई दिशा, नया उत्साह, नयी उमंग, नई प्रेरणा, नए संकल्प, नए लक्ष्य देने के लिए यह एक अवसर बनकर रह जाता है और उस अवसर को हमें लेना चाहिए।

एकनाथजी कभी हार माननेवाले नहीं थे। वे हर आपत्ति को अवसर में पलटना, इसी को अवसर मानते थे। आपत्ति को अवसर में पलटना! जब शिलान्यास की चर्चा चल रही थी, बहुत कठिनाईयां थीं। सरकारें अनुकूल नहीं थीं। उस पर क्लेम करनेवाले बहुत लोग थे। मछुआरों के सामने संकट था कि हमारी रोजी-रोटी का क्या होगा। कई प्रकार के संकट थे, लेकिन उन सारे संकटों को समझौते के माध्यम से, समाज के लोगों को साथ ले करके, उसका निराकरण हुआ। आज हिंदुस्तान के हर नागरिक को किसी जमाने में बद्रीनाथ-केदारनाथ की यात्रा करने का मन होता  था...आज देश के नोजवान को शिला स्मारक पर जाने का मन कर जाता है। ये काम इस पीढ़ी में इस महापुरूष ने किया। लेकिन उन्होंने निर्जीव स्मारक नहीं बनाया। एक चेतनबद्ध व्यपवस्था को खड़ा कर दिया, जो चेतनबद्ध व्यवस्था समाज के जीवन में अविरल चेतना भरने का काम कर रही है। नई पीढ़ी निकलती रहे, राष्ट्र के प्रति समर्पित होती रहे और राष्ट्र कल्याण के लिए अपना जीवन लगाती रहे, इस परंपरा को उन्होंने आरंभ किया।

मेरा सौभाग्य है, ऐसे महापुरूष की उंगली पकड़कर चलने का मुझे अवसर मिला है। ये सौभाग्य छोटा नहीं होता है। कभी वे सर पर हाथ रखते थे, पुचकारते थे मुझे। कभी-कभी मैं देखता था, वे दोपहर को सोते नहीं थे और हम उस वक्त सोते थे। तो मुझे कहते थे, खाना खाने के बाद हम टहलेंगे। तो वे टहलने के लिए ले जाते थे। उन्होंने मेरा दोपहर को सोने का बंद करवा दिया था। यानी, छोटी-छोटी चीजें, एक साथी को कैसे Develop करना, अपने साथी को कैसे विकसित करना, उसके विषय में कितना जागरुक प्रयास करना, ये उनके जीवन की विशेषता रही थी। मैं उनके जीवन को, उनके कार्य को, उनके सपनों को नमन करता हूं। मुझे विश्वास है यह प्रयास देश के युवा पीढ़ी को सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा देगा। सफलता से सार्थकता की ओर कैसे आगे बढ़ें, इसका रास्ता प्रशस्त करेगा और सामान्य मानव के जीवन में सार्थक होने का सपना जगे, इस दिशा में प्रयास सफल होंगे, ऐसा मुझे पूरा विश्वास है।

मैं फिर एक बार इस महान प्रयास के लिए विवेकानन्द केन्द्र से जुड़े हुए सभी लोगों को हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं। बहुत-बहुत साधुवाद देता हूं। 

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