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एकनाथजी को हर कार्य में ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ से कुछ भी कम स्वीकार नहीं था। वे एक परफेक्शनिस्ट के रूप में जाने जाते हैं। परफेक्शन उनका स्वाभाविक गुण था। एकनाथजी का यह स्वभाव ही है जिसके कारण उन्होंने असंभव लगनेवाले कार्यों को संभव कर दिखाया। नकारात्मकता का अंश मात्र भी उनमें नहीं था, एकबार जो ठान लिया उसे पूरा करने के लिए सारी शक्ति लगा देते थे। कल्पना करना, नीत नई योजना बनाना और उसे साकार करना उनकी विशेषता थी। देवदुर्लभ कार्यों को विजिगीषु वृत्ति से पूर्ण करनेवाले एकनाथजी सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत सभी कार्यकर्ताओं के लिए एक महान आदर्श हैं, ऐसा कहते हुए संघ प्रमुख डॉ.मोहन भागवत ने एकनाथ रानडे के जीवन से जुड़े अनेक प्रसंगों और विचारों को व्यक्त किया। वे गत सप्ताह 30 दिसम्बर को नागपुर स्थित न्यू इंग्लिश हाय स्कूल द्वारा आयोजित व्याख्यान समारोह में ‘एकनाथ रानडे : व्यक्ति और कार्य’ इस विषय पर सम्बोधित कर रहे थे।

उल्लेखनीय है कि विवेकानन्द शिलास्मारक के निर्माता और विवेकानन्द केन्द्र के संस्थापक श्री एकनाथ रानडे ने न्यू इंग्लिश हाय स्कूल में शिक्षार्जन किया था। चूंकि इस वर्ष विवेकानन्द केन्द्र द्वारा देशभर में एकनाथजी का जन्मशताब्दी समारोह मनाया जा रहा है, न्यू इंग्लिश हाय स्कूल ने भी इस उपलक्ष्य में व्याख्यान समारोह का आयोजन किया। इस समारोह में सरकार्यवाह भैयाजी जोशी, संस्था के अध्यक्ष अनंतराव व्यवहारे तथा विवेकानन्द केन्द्र के महाराष्ट्र प्रान्त संगठक विश्वास लपालकर व्यासपीठ पर विराजमान थे।     

बतौर मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अपने भाषण के प्रारंभ में कहा कि एकनाथजी का जन्म शताब्दी मनाना महज एक औपचारिकता पूर्ण करना नहीं है, वरन उनके जीवित कार्य को समझकर उस ध्येय की पूर्ति करना है जिसे स्वामी विवेकानन्द ने देखा था। उन्होंने बताया कि एकनाथजी का पूरा जीवन स्वामी विवेकानन्द के ध्येय सिद्धि के लिए समर्पित था। उन्होंने संघ में रहकर एक स्वयंसेवक से सरकार्यवाह तक के दायित्व को बड़ी कुशलता से निभाया। संघ के दायित्वों को निभाते हुए ही उन्होंने स्वामी विवेकानन्द के साहित्यों का अध्ययन किया। यही कारण है कि उनके व्यक्तित्व, कृतित्व और नेतृत्व में उनकी छाप दिखाई देती है।

संघ प्रमुख ने जोर देते हुए कहा कि स्वामी विवेकानन्द के विचार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार में कोई अंतर नहीं है। इसी प्रकार विवेकानन्द केन्द्र और संघ का कार्य भी भिन्न नहीं वरन एक ही है, केवल शैली अलग है। संघ और विवेकानन्द केन्द्र दोनों ही स्वामीजी के बताए मार्ग को समाज जीवन में प्रतिष्ठित करने के लिए ‘मनुष्य निर्माण’ का कार्य कर रहा है। उन्होंने बताया कि जिस तरह स्वामीजी कहा करते थे कि प्रत्येक व्यक्ति में दिव्यत्व विद्यमान है, और उसके जीवन का निश्चित प्रयोजन है, एकनाथजी ने इसी विचार को अपने कार्य का अंग बनाया। एकनाथजी ने प्रत्येक व्यक्ति के दिव्यत्व और क्षमता को पहचाना, और प्रयोजन का बोध कराकर उसके अनुरूप कार्य की योजना बनाई। विवेकानन्द केन्द्र इसी योजना का साकार रूप है। आज विवेकानन्द केन्द्र का कार्य बढ़ रहा है, इसे और भी विस्तारित होना है।

डॉ.भागवत ने विवेकानन्द शिलास्मारक के निर्माण से जुड़े अनेक प्रसंग भी बताए। उन्होंने कहा कि तमाम विरोधों के बीच विरोधियों को भी अपने मिशन से जोड़ने का अदभुत सामर्थ्य एकनाथजी में था। सामान्य जनता और सभी जन प्रतिनिधियों से धन संगृहित कर शिलास्मारक का निर्माण करना अपनेआप में बहुत बड़ी उपलब्धि है। विवेकानन्द शिलास्मारक यह एकनाथजी की वास्तविक पहचान है। संघ प्रमुख ने श्री गुरूजी गोलवलकर से जुड़े एकनाथजी के प्रसंग की भी चर्चा की और कहा कि एकनाथजी श्री गुरूजी के पांच रत्नों में से एक थे।

सरसंघचालक ने कहा कि एकनाथजी जीवनभर सीखते रहे। हर गलती से सीखा और उसे दोबारा नहीं दोहराया। शरीर से बलवान, मन से निर्भय और हर समय सजग रहनेवाले एकनाथजी के लिए विवेकानन्द के सिवाय कोई विषय ही नहीं था। अभाव और अज्ञानता से समाज को मुक्ति दिलाना एकनाथजी का लक्ष्य था। एकनाथजी ऐसे कार्यकर्ता थे जिनसे मिलनेवाले हर व्यक्ति को स्नेह ही मिला। वे सरल थे पर भोले नहीं, यह उन्होंने अपने जीवन से सीखा था। आज जब उनकी जन्म शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है हमें उन्हीं की तरह बनाना होगा, स्वामी विवेकानन्दजी के ध्येय को प्राप्त करने के लायक बनाना होगा। इस समारोह में भारी संख्या में नगर के गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। 

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